Friday, February 20, 2026

भोजपुरी लोक संगीत और लोक गीत : मिट्टी की खुशबू, दिल की आवाज

भोजपुरी लोक संगीत भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का एक जीवंत हिस्सा है। यह संगीत मुख्यतः Bihar, Uttar Pradesh के पूर्वी क्षेत्रों और Nepal के तराई इलाकों में प्रचलित है। इन गीतों में ग्रामीण जीवन, प्रेम, विरह, उत्सव, प्रकृति और सामाजिक भावनाओं की सच्ची झलक मिलती है।
भोजपुरी लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की आत्मा हैं—ये पीढ़ी दर पीढ़ी परंपराओं को जीवित रखते हैं।
🎼 भोजपुरी लोक गीतों के प्रमुख प्रकार
1. सोहर
जब किसी घर में बच्चे का जन्म होता है, तो महिलाएँ मिलकर “सोहर” गाती हैं। यह गीत खुशियों और आशीर्वाद से भरे होते हैं।
2. कजरी
सावन-भादो के महीने में गाया जाने वाला कजरी गीत प्रेम और विरह की भावनाओं को व्यक्त करता है।
3. फगुआ (होली गीत)
होली के अवसर पर गाए जाने वाले फगुआ गीत रंग, उमंग और हास्य से भरपूर होते हैं।
4. बिरहा
बिरहा गीत विरह (जुदाई) और भावनात्मक दर्द को दर्शाते हैं। यह शैली लोक गायक की गायन कला को विशेष पहचान देती है।
5. चैता
चैत्र महीने में गाया जाने वाला चैता गीत भक्ति और श्रृंगार रस से युक्त होता है।
🪕 लोक वाद्य यंत्रों की भूमिका
भोजपुरी लोक संगीत में कई पारंपरिक वाद्य यंत्रों का उपयोग होता है, जैसे:
ढोलक
हारमोनियम
मंजीरा
तबला
इन वाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनि गीतों में ऊर्जा और लय भर देती है।
🌾 भोजपुरी लोक संगीत की विशेषताएँ
सरल और सहज भाषा
लोक जीवन से जुड़ी भावनाएँ
सामूहिक गायन की परंपरा
त्योहारों और संस्कारों से गहरा संबंध
भोजपुरी लोक गीतों में गाँव की मिट्टी की सोंधी महक और जीवन की सादगी झलकती है।
🎤 प्रसिद्ध भोजपुरी लोक गायक
भोजपुरी लोक संगीत को नई पहचान दिलाने में कई कलाकारों का योगदान रहा है, जैसे:
Manoj Tiwari
Kalpana Patowary
Bharat Sharma Vyas
इन कलाकारों ने पारंपरिक लोकधुनों को आधुनिक मंच तक पहुँचाया है।
🌎 वैश्विक पहचान
आज भोजपुरी लोक संगीत केवल भारत तक सीमित नहीं है। Mauritius, Suriname और Fiji जैसे देशों में बसे प्रवासी भारतीयों ने भी इसे जीवित रखा है।
✍️ निष्कर्ष
भोजपुरी लोक संगीत हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। यह केवल गीत नहीं, बल्कि भावनाओं का सागर है—जिसमें प्रेम, पीड़ा, खुशी और परंपरा सब कुछ समाहित है।
यदि हम अपनी लोक संस्कृति को बचाए रखना चाहते हैं, तो हमें इन गीतों को सुनना, सीखना और अगली पीढ़ी तक पहुँचाना होगा।
🎶 “भोजपुरी लोक गीत, दिल से दिल तक की आवाज़।”

Tuesday, January 13, 2026

पुस्तक मेला

हर साल की भांति इस बार भी दिल्ली के प्रगतिमैदान में पुस्तक मेले का आयोजन किया गया है जसमें देश और दुनिया के प्रमुख प्रकाशक इसमें हिस्सा लिए हैं और अपनी उत्कृष्ट कृतियों के साथ पाठकों के बीच उपस्थित हुए हैं। एक दिन मुझे भी इसका चश्मदीद बनने का मौका मिला। 
भांति भांति के पाठक और क्रेताओं से रु ब रु होने और उनमें से कुछ जो मेरे पुराने मित्र रहे हैं, से हाथ मिलाकर अभिवादन करने का सौभाग्य मिला। हर किसी को अपने पुराने मित्रों से मिलकर आनंदित होना अच्छा लगता है। इसबार की पुस्तक मेला कई मायनों में यादगार रही, जिसमें से एक रिटायर्ड लोगों से अप्रत्याशित मुलाकात और उनसे मिला स्नेह/प्यार, दूसरा उभरते हुए "रचनाकारों" से मिला कटाक्ष। इससे यही प्रतीत होता है कि सकारात्मक रूप से आगे बढ़ने वाला व्यक्ति कितनों के लिए चुनौती होता है। क्योंकि वह अपने रास्ते बिना किसी की चरण वंदना किए निरंतर समाज, संस्कृति और साहित्य को कुछ अंकिंचित दे रहा होता है। उसके निश्छलपन में बहुत सारे ज्ञान के स्रोतों का मुकम्मल समावेश देखने को मिलता है, जिससे वंदनीय प्रवृति के लोग अपनी कलई खुलता देख लकीर मिटाना चाहते हैं। यह मानसिकता किसी भी समाज का स्वस्थ प्रतिबिंबन नहीं कर सकता। इसिलिए शुरू से मैं उन्हीं लेखकों को पढ़ना पसंद करता हूं जो रचनाकार के साथ साथ सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय समाजसेवी रहे हैं। उनके साहित्य में नवीनता का प्रस्फुटन और अनछुए पहलुओं पर गंभीर वैचारिकी से सीखने को मिलती है। 

ख़ैर, हम जैसे मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं को काल्पनिक दुनियां जमती नहीं। इसलिए उनका पसंदीदा कथानक धरातल से जुड़ा सकारात्मक पक्षों को लेकर चलने वाला होता है। साहित्य में नए नए विमर्शों को जगह मिल रही है। यह अच्छा है कि इससे ज्ञान का अन्य पक्ष भी और मजबूती पाएगा, इससे आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा भी मिलेगा। देखते हैं कि और कितनी विद्याओं में विमर्श स्थान पाता है..