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Tuesday, January 13, 2026

पुस्तक मेला

हर साल की भांति इस बार भी दिल्ली के प्रगतिमैदान में पुस्तक मेले का आयोजन किया गया है जसमें देश और दुनिया के प्रमुख प्रकाशक इसमें हिस्सा लिए हैं और अपनी उत्कृष्ट कृतियों के साथ पाठकों के बीच उपस्थित हुए हैं। एक दिन मुझे भी इसका चश्मदीद बनने का मौका मिला। 
भांति भांति के पाठक और क्रेताओं से रु ब रु होने और उनमें से कुछ जो मेरे पुराने मित्र रहे हैं, से हाथ मिलाकर अभिवादन करने का सौभाग्य मिला। हर किसी को अपने पुराने मित्रों से मिलकर आनंदित होना अच्छा लगता है। इसबार की पुस्तक मेला कई मायनों में यादगार रही, जिसमें से एक रिटायर्ड लोगों से अप्रत्याशित मुलाकात और उनसे मिला स्नेह/प्यार, दूसरा उभरते हुए "रचनाकारों" से मिला कटाक्ष। इससे यही प्रतीत होता है कि सकारात्मक रूप से आगे बढ़ने वाला व्यक्ति कितनों के लिए चुनौती होता है। क्योंकि वह अपने रास्ते बिना किसी की चरण वंदना किए निरंतर समाज, संस्कृति और साहित्य को कुछ अंकिंचित दे रहा होता है। उसके निश्छलपन में बहुत सारे ज्ञान के स्रोतों का मुकम्मल समावेश देखने को मिलता है, जिससे वंदनीय प्रवृति के लोग अपनी कलई खुलता देख लकीर मिटाना चाहते हैं। यह मानसिकता किसी भी समाज का स्वस्थ प्रतिबिंबन नहीं कर सकता। इसिलिए शुरू से मैं उन्हीं लेखकों को पढ़ना पसंद करता हूं जो रचनाकार के साथ साथ सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय समाजसेवी रहे हैं। उनके साहित्य में नवीनता का प्रस्फुटन और अनछुए पहलुओं पर गंभीर वैचारिकी से सीखने को मिलती है। 

ख़ैर, हम जैसे मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं को काल्पनिक दुनियां जमती नहीं। इसलिए उनका पसंदीदा कथानक धरातल से जुड़ा सकारात्मक पक्षों को लेकर चलने वाला होता है। साहित्य में नए नए विमर्शों को जगह मिल रही है। यह अच्छा है कि इससे ज्ञान का अन्य पक्ष भी और मजबूती पाएगा, इससे आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा भी मिलेगा। देखते हैं कि और कितनी विद्याओं में विमर्श स्थान पाता है..